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बेतिया : चमकी की चपेट में आई परिधि को मिली नई जिन्दगी..पिता की जागरूकता ने बचाई जान

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पिता की जागरूकता ने परिधि को दी नई जिंदगी

– बगहा अनुमंडल के सलाहा गांव निवासी रत्नेश की 3 साल की बच्ची आ गई थी चमकी की चपेट में

– आशा, एएनएम, सेविका और जीविका दीदियों का अभियान लोगों को कर रहा है जागरूक

बेतिया 4 जुलाई : चमकी बुखार (Faver) जैसी जानलेवा बीमारी (Bimari) को मात देकर घर वापस (home return) लौट रहे बच्चों के आंकड़े सरकार के चौतरफा प्रयासों की सफलता को दर्शाते हैं। लोग यह जान गए हैं कि अचानक से खेलता-कूदता बच्चा अगर बेहोश हो जाता है, तो यह जादू-टोना का मामला नहीं, बल्कि एईएस (एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम) (Acute encephalitis syndrome) का लक्षण हो सकता है। ऐसे में इधर-उधर समय गंवाकर बच्चे की जान जोखिम में डालने से बेहतर है कि तुरंत सरकारी अस्पताल (Hospital) का रुख किया जाए। अब ऐसे मामलों में गांव के निजी क्लिनिक वाले डॉक्टर भी अपनी जिम्मेदारी निभाने लगे हैं। वे तुरंत बच्चे को सरकारी अस्पताल ले जाने की सलाह देते हैं। ऐसा ही एक मामला बगहा के सलाहा गांव का है। जागरूक पिता की तत्परता और निजी डॉक्टर की सही सलाह ने एक बच्ची को चमकी जैसी जानलेवा बीमारी की चंगुल से निकल लिया। आज बच्ची पूरी तरह स्वस्थ है।

केस स्टडी :

बात 21 मई 2020 की है। बगहा अनुमंडल (पश्चिमी चंपारण) के सलाहा गांव निवासी रत्नेश कुमार की तीन साल की बिटिया परिधि चमकी की चपेट में आ गई। पहले बुखार लगा। दवा देने पर ठीक हो गई, लेकिन दूसरे दिन सुबह में तेज बुखार चढ़ा। दोपहर होते-होते 103 डिग्री फीवर आ गया। रत्नेश अपनी बच्ची को बेतिया में एक प्राइवेट डॉक्टर के पास ले गए। डॉक्टर को चमकी के लक्षण का आभास हो गया। उन्होंने सलाह दी कि बच्ची को सरकारी अस्पताल में ले जाइए। अगर चमकी बुखार का मामला हुआ तो वहां बेहतर इलाज हो पाएगा। जरूरत पड़ने पर वहां से रेफर भी कर देगा। रत्नेश बताते हैं कि वे दो बजे रात में बच्ची को लेकर सरकारी अस्पताल गए। बच्ची की हालत बिगड़ती देख पिता का हाल बेहाल हो रहा था। वे लगातार डॉक्टर से कह रहे थे कि बच्ची को एसकेएमसी (SKMC) अस्पताल मुजफ्फरपुर रेफर (Muzaffarpur Refer) लिख दीजिए। डॉक्टर को भी लगा कि बच्ची की हालत में सुधार के लिए एसकेएमसीएच रेफर किया जाना जरूरी है। फिर रत्नेश एम्बुलेंस (Ambulance) का इंतजाम कर बच्ची को लेकर मुजफ्फरपुर एसकेएमसी अस्पताल आए। वहां बच्ची को 23 तारीख को भर्ती किया गया। 10 दिन बाद परिधि जब पूरी तरह स्वस्थ (Health) हो गई तो उसे डिस्चार्ज किया गया। आज वह नन्ही सी जान घर में सबके चेहरे पर मुस्कान बिखेर रही है।

रंग ला रहा सरकार का चौतरफा प्रयास :

प्रभावित जिलों में ऊपरी स्तर पर जिलाधिकारी से लेकर सबसे निचले स्तर पर टोले में विकास मित्र तक की सक्रिय भूमिका आज एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) को पछाड़ने में कारगर सिद्ध हो रही है। पंचायतों में जिस युद्ध स्तर पर आशा, एएनएम, सेविका/सहायिका और जीविका दीदियों ने घर-घर जाकर जागरुकता की मशाल जलाई है, वह प्रयास अब लोगों के घरों का चिराग नहीं बुझने देते। बच्चे में जरा-सा भी ऐसा लक्षण नजर आते ही लोग तुरंत सरकारी अस्पताल का रुख करते हैं। रत्नेश जैसे जागरूक पिता की तत्परता दूसरों को भी चमकी बुखार के खतरे से सतर्क रहने की प्रेरणा देगी।

रिपोर्ट : अमित कुमार