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मोकामा : लाकडाउन की बजह से लोगों को नहीं मिल पा रही बेहतर स्वास्थ्य सेवा..धोना पड़ रहा है जान से हाथ

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पटना : मोकामा एक तरफ कोरोना से बचने के लिए जहां पूरे देश में लॉकडाउन है।कोरोना से किसी की मौत न हो इसके लिए लोगों को प्रधानमंत्री लगातार अपने अपने घरों में रहने के लिए बोल रहे हैं। वहीं दूसरी ओर लॉकडाउन में यातायात के साधन बंद होने का साइड इफेक्ट ये है कि पटना जिला अंतर्गत मोकामा प्रखंड के लोग बेमौत मर रहे हैं।बुधवार को मोकामा नगर परिषद के वार्ड संख्या 12 निवासी प्रभाकर पांडे की पत्नी की मौत सरकारी अव्यवस्था की वजह से हो गई।अभी साल भर पूर्व भी उनकी शादी हुई थी और उन्होंने मात्र 9 दिन पूर्व एक बच्चे को जन्म दिया था। 9 दिन के मासूम से मां की ममता छीन गई।जबकि वहीं तीन दिन पूर्व चिंतामणिचक फाटक पर के रहने वाले 25 वर्षीय नवयुवक संतोष दास की मृत्यु हो गई।इस बीच और भी कुछ लोगों के अकाल मृत्यु की सूचना मिल रही है।आखिर इन मौतों का जिम्मेदार कौन है ?इनकी मृत्यु सिर्फ इस वजह से हो गई कि मोकामा रेफरल अस्पताल खुद बदहाल है, नाजरथ अस्पताल सिर्फ धर्म परिवर्तन का अड्डा बन कर रह गया है तो वहीं लॉकडाउन की वजह से यातायात के साधन बंद हैं और लोग बेहतर इलाज के लिए पटना या बेगूसराय नहीं जा पाए।कुछ स्थानीय पत्रकारों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कई बार इस संबंध में अखबारों एवं सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश की। परंतु अफसोस सरकार की नजर में मोकामा वासियों के जान की कोई कीमत ही नहीं है।बदतर स्वास्थ्य व्यवस्था की वजह से सैकड़ों लोगों की जान विगत वर्षों में जा चुकी है,परंतु सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती।स्थानीय एक नेता सरकार में मंत्री हुई हैं,एक नेता सरकार में सहयोगी की भूमिका में हैं बावजूद मोकामा के लोगों को स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर कुछ भी हासिल नहीं है। महीनों पूर्व सरकार के मुखिया ने यहां ट्रामा सेंटर बनवाने की घोषणा की थी परंतु आज की तारीख तक वह धरातल पर नजर नहीं आ रहा।ऐसी चर्चा जोरों पर है कि उसका काम शीघ्र शुरू होने वाला है परंतु शायद तब तक कितने मकान वासियों की मौत हो चुकी होगी।स्थानीय नेता लाशें गिनते हैं,घर पर पहुंचकर सांत्वना देते हैं और फिर चुनाव में वोट मांगने पहुंच जाते हैं।

                              रिपोर्ट : विक्रांत कुमार

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