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मोतिहारी : लॉकडाउन में भी नहीं थमा गांवों में ‘जीविका’ का पहिया

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– खेतीबारी और मास्क निर्माण कार्य से खुशहाली की ओर बढ़ रहीं जीविका दीदियां

– तुरकौलिया प्रखंड के 1500 से अधिक समूहों की हजारों महिलाएं हुईं हैं आत्मनिर्भर

मोतिहारी, 23 जुलाई : कोरोना (Corona) महामारी के दौर में हर तरफ रोजगार पर गहराये संकट के बीच गांवों से एक अच्छी खबर है। खेती-किसानी और लघु उद्योग से जीविका दीदियां खुशहाली की ओर बढ़ रही हैं। लॉकडाउन (Lockdown) में भी यहां जीविका का पहिया रुका नहीं है। (wheel of livelihood has not stopped).उदहारण के तौर पर तुरकौलिया प्रखंड में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ीं जीविका दीदीयों को ले सकते हैं। संक्रमण (Infection) के कारण मास्क की मांग बढ़ने पर जीविका दीदियां मास्क निर्माण कार्य में जुटी है. साथ ही कोरोना के प्रति लोगों को जागरूक करने की भी मुहिम में शामिल होकर सामाजिक दायित्वों का भी निर्वहन कर रही है. संक्रमण काल में आलू, मक्का सहित हरी सब्जियां की खेती से भी इनकी स्थिति बेहतर हो रही है।

17000 महिलाएं हुई हैं आत्मनिर्भर :

तुरकौलिया के जीविका बीपीएम सुभाष कुमार बताते हैं प्रखंड में 1500 से ज्यादा स्वयं सहायता समूहों की करीब 17000 महिलाएं जीविका से जुड़ कर आत्मनिर्भर हुई हैं। लॉकडाउन में भी इनका काम प्रभावित नहीं हुआ। ये आंकड़े महज एक प्रखंड के हैं। इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि जीविका ने महिलाओं (Women) को स्वावलंबी बनाने में कितनी बड़ी भूमिका निभाई है। महामारी के इस दौर में भी बेरोजगारी का साया इन तक नहीं पहुंच पाया। खेती-किसानी के अलावा मास्क निर्माण से उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर हुई है। यह स्थिति महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की सरकार की बेहतर योजनाओं की सफलता को दर्शाती है।

पार्वती और भूमि जीविका महिला ग्राम संगठन कर रहे बेहतर कार्य :

लॉकडाउन में भी जीविका महिला ग्राम संगठनों से जुड़े स्वयं सहायता समूहों की जीविका दीदियों का काम जारी है। लॉकडाउन के कारण उनके घर की आर्थिक स्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ा है। पार्वती और भूमि जीविका महिला ग्राम संगठन बेहतर कार्य कर रहे हैं। इससे जुड़े समूह की जीविका दीदियां आलू, मक्का सहित हरी सब्जियों की खेती कर रही हैं। सिलाई-कढ़ाई के काम में लगी महिलाएं मास्क निर्माण कर आपदा को अवसर में बदल रही हैं।

ऐसे गठित होता है समूह :

कम्युनिटी कोऑर्डिनेटर संजीत कुमार ने बताया वह पहले गांवों में जाकर ग्राम सभा करते हैं। इसके बाद 10 से 12 महिलाओं का समूह गठित किया जाता है। इनमें से एक अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष का चुनाव किया जाता है। समूह की महिलाएं हर सप्ताह कोषाध्यक्ष के पास बचत किए हुए पैसे जमा करती हैं। ये पैसे समूह की महिलाओं को रोजगार के लिए ऋण के रूप में दिए जाते हैं। परियोजना की ओर से भी रिवॉल्विंग फंड के रूप में 15000 की राशि ऋण के रूप में प्रदान की जाती है।

प्रशिक्षण देकर किया जाता है दक्ष :

जीविका के द्वारा एसएचजी मॉड्यूल-1,2,3 के तहत समूह की महिलाओं को गरीबी, नेतृत्व क्षमता और बैठक (Miting) प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताया जाता है। समूह के पंच सूत्र-नियमित साप्ताहिक बैठक, नियमित साप्ताहिक बचत, नियमित लेन-देन, नियमित ऋण वापसी और लेखांकन के बारे में बताया जाता है। प्रशिक्षण के बाद समूह में कार्य कर ये महिलाएं गांव में उद्यमिता का माहौल तैयार करती हैं।

रिपोर्ट : अमित कुमार