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नालंदा : रोपनी के पहले जरूरी है खरपतवार का निदान.. मिट्टी को करना होगा उपचारित

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रोपणी के पहले खरपतवार का निदान जरुरी

* फास्फेटिक और पोटाश खाद से मिट्टी का उपचार करें

नालंदा (बिहार) : हरनौत लंबी (Harnaut Long) व मध्यम अवधि (Period) के धान के बिचड़े जो पंद्रह या अधिक दिन के रोपणी के लायक हो चुके हों उनकी रोपाई का काम तत्काल शुरू (Transplanting starts immediately) कर दें। अगर बिचड़े तैयार होने में कुछ समय हो तो रोपाई वाले खेत में कादो करके छोड़ दें। इससे उसके खरपतवार मिट्टी में मिलकर सड़ गल जायेंगे। इसके अलावा रोपाई से पहले खेत के रकवा व उसकी गहराई के अनुसार मिट्टी का फास्फेटिक और पोटाश खाद (Potash manure) से उपचार कर दें। इस समय इनकी पूरी मात्रा दी जा सकती है। जबकि, नाइट्रोजन को तीन हिस्सों में बांटकर रोपाई के बीसवें दिन, साठ से 65 वें दिन और फिर बाली निकलते समय दे सकते हैं। इससे किसान धान की बेहतर उपज पा सकते हैं। ये जानकारी कृषि विज्ञान केंद्र के मिट्टी विशेषज्ञ डॉक्टर उमेश नारायण उमेश ने दी।
डॉ उमेश ने बताया कि फास्फेटिक खाद के लिए किसान डीएपी, एसएसपी या मिक्सचर का प्रयोग करें। यह बिचड़े की जड़ों को मिट्टी में जमाने और फैलाव में मदद करता है। कहा जाता है कि जड़ें मज़बूत होंगी तो उसपर उपज भी अच्छी लगेगी।
यही वजह है कि फास्फेटिक खाद का उपयोग खेत में कादो करते समय कर देना चाहिए। क्योंकि इसे टूटने में आठ-दस दिन का समय लगता है। रोपाई के पहले इस खाद का प्रयोग अधिक लाभकारी होता है।
उन्होंने बताया कि आजकल किसान ट्रैक्टर से एक दिन में खेत तैयार करके रोपणी शुरू कर देते हैं। इससे खरपतवार पूरी तरह नष्ट नहीं हो पाते हैं। साथ ही रोपणी के बाद फास्फेटिक खाद देने से पौधे को उसका पूरा फायदा नहीं मिल पाता है। अलबत्ता खरपतवार की बढ़वार से फसली पौधों को नुकसान जरुर हो जाता है। उपज में 15 से 20 फीसदी तक हानि हो जाती है। इसी तरह पोटाश खाद की पूरी मात्रा भी बिचड़े की रोपणी से पहले देना चाहिए। यह मिट्टी में मिलकर बना रहता है और पौधे आवश्यकता नुसार इसका इस्तेमाल करते हैं।
डॉ उमेश ने बताया कि नाइट्रोजन (Nitrogen) खाद की पूरी मात्रा एक बार में नहीं देनी चाहिए। इससे इसके पानी के साथ बह जाने अथवा पानी के साथ मिट्टी में अवशोषित होने की संभावना रहती है। इस वजह से नाइट्रोजन को तीन हिस्सों में बांटकर देना चाहिए। यदि रोपणी की है तो रोपणी के 20 से 25 दिन में एक हिस्सा देना है। जबकि, बोगहा तरीके से खेती में 40 से 45 दिन पर देना है। इसके बाद कल्ले निकलने पर और फिर बाली निकलने के समय नाइट्रोजन देने का बेहतर समय होता है।

रिपोर्ट : गौरी शंकर प्रसाद