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नालंदा : कोरोना संकट.. सब्जियों का कारोबार हुआ प्रभावित.. नहीं मिल रहे खरीददार

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नालंदा (बिहार) हरनौत : कोरोना वायरस के फैलाव को नियंत्रण करने के लिये पिछले 52 दिनों से देश में संपुर्ण लॉकडाउन है। ऐसे में सब्जी उत्पादकों के सामने नित नई परेशानी सामने आ रही है।
लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में मीट-मछली के कारोबार पर सख्ती से रोक थी। इस वजह से सब्जियों के उत्पादन और डिमांड में अधिक अंतर नहीं था।
इसका एक पहलू यह भी है कि आइसक्रीम, गोलगप्पे, फास्ट फूड आदि के खोमचे लगाने वालों का कारोबार भी बंद हो गया था। इस वजह से वे फल-सब्जी की चलती-फिरती दुकान लेकर दूर-दराज गांवों में बेच आते। इससे उनके परिवार का जीविकोपार्जन भी हो रहा था।
उस समय चिकेन का भाव औने-पौने हो गया था।
पर, इन्हें बेचने की जैसे ही राज्य से स्वीकृति मिली। कोरोना से बचाव में मांसाहार को उपयोगी बताने की बातें भी खूब वायरल हुई। नतीजा यह हुआ कि पचास रुपये में दो किग्रा तक का मिलने वाला खड़ा मुर्गा अभी एक सौ साठ रुपये प्रति किग्रा मिल रहा है। मछलियां तो पहले ही ढाई से चार सौ रुपये प्रति किग्रा बिक रही है।
यह अलग बात है कि बकरे के मांस का कारोबार मुख्यत: मुस्लिम लोग ही करते थे। कोरोना संकट में ऐसी बातें सामने आई कि उनका धंधा तो चौपट हुआ ही। उन्हें छुपने-छुपाने की जरुरत आन पड़ी।
अब कहीं-कहीं बुधवार अथवा रविवार को व्यवसायी वर्ग के लोग ही बकरे को हलाल कर उसका मीट बेचते हैं। हालांकि, हलाल करने से पहले ही उसके मीट बुक हो जाते हैं। उसमें भी अच्छी कीमत मिल जाती है।
जबकि, सब्जियों का कारोबार मंदा हो गया है। बीस से साठ रुपये तक प्रति किग्रा बिक्री वाले करैला, परोर, परबल, कद्दू को दस से पंद्रह रुपये भी नहीं मिल पा रहे हैं।
लॉकडाउन के अंतिम घंटे में ढेरी के हिसाब से सब्जियों की बिक्री की जाती है। क्योंकि रखे रहने में नुकसान अधिक होता है।
कृषि वैज्ञानिक डॉ विभा रानी बताती हैं कि मौसम ठीक-ठाक रहने से सब्जियों की पैदावार अच्छी हुई है। जबकि लॉकडाउन के चलते इसका निर्यात बंद है। इस वजह से लोकल मार्केट में उपलब्धता अधिक होने से भाव गिरे हैं।

रिपोर्ट : गौरी शंकर प्रसाद