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नालंदा : जलवायु परिवर्तन के अनुसार हो खेती.. फसल चक्र में होगी मदद, बेहतर होगी पैदावार

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नालंदा (बिहार) हरनौत : मई के अंतिम सप्ताह में रोहण नक्षत्र प्रवेश कर रहा है। यह धान की लंबी अवधि के प्रभेद की खेती करने का सबसे अच्छा समय है। इस दौरान 140 या अधिक दिन के प्रभेद का बीज खेत में बिचड़ा के लिये गिरा दें। खासकर निचली सतह वाली जमीन जहां जलजमाव की स्थिति होती है। वहां लंबी अवधि के प्रभेद ही उपयुक्त होंगे। ये जानकारी कृषि विञान केंद्र के मिट्टी वैज्ञानिक डॉ उमेश नारायण उमेश ने दी।
उन्होंने बताया कि मध्यम ऊंचाई वाले कृषि जोत में 125 से 130 दिन वाले प्रभेद सही होंगे। अपेक्षाकृत ऊंची कृषि जोत पर 110 से 120 दिन वाले प्रभेद की खेती करें।
डॉ उमेश ने कहा कि जलवायु परिवर्तन को देखते हुए कुछ वर्षों से पहले तो कभी अंतिम समय में भारी बारिश हो जाती है। इससे फसल चक्र भी पूरा नहीं हो पाता है। इसीलिए इस बार धान की अगात खेती पर जोर है। इससे पैदावार समय पर मिलेगी। रबी फसल के लिये खेत तैयार करने का समय भी मिलेगा।

:: खेत तैयार करने का अनुकूल मौसम

केंद्र प्रभारी डॉ ब्रजेंदु कुमार ने बताया कि वर्तमान में मौसम का ताप अपने चरम पर है। खाली पड़े खेत की मिट्टी पलटने का यह सही समय है।
मिट्टी पलटने से उसमें लगे खर-पतवार नष्ट होंगे। मिट्टी के अंदर पौधे को नुकसान पहुंचाने वाले कीट-मकोड़े भी होते हैं। यह समय उनके प्रजनन काल का है। मिट्टी पलटने से वे नष्ट होंगे और आगे लगने वाली फसल को उनसे नुकसान की आशंका कम होगी।

:: फसल चक्र अपनायें, होगा फायदा

डॉ उमेश नारायण उमेश बताते हैं कि कृषि जोत में लोग पारंपरिक खेती को ही प्राथमिकता देते हैं। लगातार एक जैसी फसल लेने से खेत की मिट्टी का व्यवहार खराब होने का डर रहता है।
इससे बचाव के लिये किसान फसल चक्र का उपयोग करें।
इसमें समय पर खेती का भी लाभ मिलता है।
धान की फसल के बाद रबी में दलहन की खेती की जा सकती है। इसके बाद गेहूं की खेती करें।
गेहूं के बाद आमतौर पर खरीफ के इंतजार में खेत खाली रहता है। किसान तब मूंग, राई या सरसों की खेती भी कर सकते हैं।
इससे मिट्टी की उर्वरक क्षमता बनी रहती है। प्रत्येक फसल के अवशेष एक-दूसरे के लिये उपयोगी भी होते हैं। सिर्फ यही नहीं, बल्कि मिट्टी में पोषक तत्व का प्रबंधन भी करने में आसानी होती है।
कुछ पोषक तत्व जो पिछली फसल में अनुपयोगी थी। अगली फसल को मिल जाती है। ऐसे में खेत को खाली छोड़ने की जरुरत नहीं पड़ती है। उससे किसान सालों भर उत्पादन ले सकेंगे।

रिपोर्ट : गौरी शंकर प्रसाद