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नालंदा : अमरुद का लगा मातृ उद्यान, कुछ वर्षोंमें ही होगें तैयार, किसानों को होगी सहूलियत

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नालंदा (बिहार) : हरनौत स्थित कृषि विञान केंद्र की पहल पर हरनौत में अमरुद का पहला मातृ उद्यान विकसित किया जा रहा है। अभी इसमें इलाहाबाद सफेदा व लखनऊ के एल 49 प्रभेद के करीब सौ पौधे लगाये गये हैं। अगले दो से तीन वर्षों में इसकी लेयरिंग करके शिशु पौधे तैयार करने का काम शुरू होगा। इससे बागवानी करने वाले जिले के किसानों को अमरुद के पौधे के लिये बाहरी निर्भरता घटेगी। ये जानकारी केंद्र प्रभारी डॉ ब्रजेन्दु कुमार ने दी।
उन्होंने बताया कि अमरुद की खेती के लिये जमीन की सतह ऊंची होनी चाहिये थी। जबकि, केंद्र परिसर में जमीन की सतह नीची थी। वहां मिट्टी भरवाकर मातृ उद्यान विकसित किया गया है।
बागवानी विशेषञ डॉ विभा रानी ने बताया कि आमतौर पर अमरुद के पौधे तीन वर्षों में फुल-फल देने लगते हैं। अगर पेड़ की अच्छी फलन क्षमता चाहिए तो एक से दो वर्ष तक फुल और फल पेड़ में ही छोड़ देने चाहिए। अगर फुल-फल से पेड़ पर भार बढ़ जाय तो कुछ फलों को तोड़कर हटा देना चाहिए। इससे पेड़ की सही वृद्धि भी होगी और फलन क्षमता भी बढ़ेगी।
मिट्टी वैज्ञानिक डॉ उमेश नारायण उमेश बताते हैं कि अमरुद अथवा किसी भी फलदार पौधे की बागवानी में जमीन पर बेकार घास अथवा खर-पतवार पर नियंत्रण आवश्यक है। यह पेड़ के फलदार होने को प्रभावित करता है। इसके अलावा बगीचे की मिट्टी का पोषक तत्व प्रबंधन भी जरूरी है।
गृह वैज्ञानिक डॉ ज्योति सिन्हा ने बताया कि इलाहाबादी सफेदा और एल 49 अमरुद के प्रभेद व्यवसायिक रुप से काफी उपयोगी हैं। इलाहाबादी सफेदा अमरुद का आकार बड़ा होता है। जबकि, एल49 प्रभेद का अमरुद का आकार इलाहाबादी सफेदा से छोटा पर फलन अधिक होता है। साथ ही स्वाद में भी बेहतर होता है।

:: अमरुद का सेवन उपयोगी

डॉ राजीव रंजन सिन्हा ने बताया कि आमतौर पर शुगर व हृदय रोग के मरीज अमरुद खाने से बचते हैं। पर, यह गलत है। उनके लिये भी अमरुद का सेवन उपयोगी होता है।
इसके अलावा बच्चों में अमरुद खाने से ठंढी सर्दी-खांसी की बात कही जाती है। यह सभी फलों पर लागू होता है। इसलिये फल खाने का बेहतर समय दोपहर बारह बजे के पहले है। इस समय सेवन से फायदा अधिक होता है।
इसमें पिक्टिन नाम का एंटीऑक्सीडेंट होता है। इससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। फाइबर होने से पाचन संबंधी समस्या दूर करता है। विटामिन सी की भी भरपूर मात्रा होती है।

रिपोर्ट : गौरी शंकर प्रसाद