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नालंदा : रोजगार सृजन का बेहतर विकल्प है पौल्ट्री आधारित कृषि और मछली पालन.. मिट्टी के लिए टानिक है पाल्ट्री अवशिष्ट

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नालंदा (बिहार) : हरनौत प्रखंड में नेहुसा, अमरपुरी, हसनपुर, सिरसी, नंदाबिगहा सहित कई गांवों में कुछ समय से पॉल्ट्री आधारित कृषि व मछली पालन का काम जोर-शोर से चल रहा है। रोजगार सृजन के साथ यह जैविक तरीके से कृषि प्रबंधन व मछली पालन के लिये तालाब प्रबंधन का एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है।
इससे मिट्टी की उपजाऊ क्षमता बढ़ाने के लिये रासायनिक खाद व कीटनाशी पर निर्भरता भी कम होती है। साथ ही तालाब में मछलियों के पोषण के लिये अतिरिक्त चारे की जरुरत भी नहीं पड़ती है। यही नहीं, वर्ष में जब भी मछली पालन के तालाब की उड़ाही होती है तो उसका पानी और तालाब की तली में जमा गाद कृषि जोत की मिट्टी के लिये वरदान से कम नहीं होता।
बीएओ रामदेव राम बताते हैं कि पॉल्ट्री फॉर्म में मुर्गे-मुर्गियों की बीट जानकारी के अभाव में लोग फेंक देते हैं। जबकि उसमें नाइट्रोजन और फास्फोरस की बहुत अधिक मात्रा होती है। इसमें ह्युमिक एसिड भी होता है।
मिट्टी में जैविक खाद की तरह इसके प्रयोग से खासकर उत्पादित फल-सब्जियों का आकार सामान्य से बड़ा होता है।
यही नहीं, बल्कि खाद के रुप में इसके लगातार प्रयोग से मिट्टी की संरचना मजबूत होती है। इससे मिट्टी प्रतिरोधी भी होती है। फसल में लगने वाले कीट-व्याधि का असर कम होता है।
हालांकि, जिस तरह सीधे ताजा गोबर का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। क्योंकि वह सड़ने के बाद खाद का काम करता है। जबकि पॉल्ट्री अवशिष्ट मूल रुप से हाईजेनिक होता है। इसके सीधे इस्तेमाल से छोटे पौधे जल सकते हैं। जबकि बड़े पौधों में इसकी न्युनतम मात्रा दी जा सकती है। इसी वजह से पॉल्ट्री अवशिष्ट को कुछ समय तक सड़ा करके उपयोग में लाना चाहिये।

:: मछली पालन के लिये बेहतर है पॉल्ट्री अवशिष्ट

कृषि विञान केंद्र के प्रभारी डॉ ब्रजेन्दु कुमार ने बताया कि एक हेक्टेयर तालाब में मछली पालन के साथ पांच से छह सौ पक्षियों की पॉल्ट्री अच्छी होती है। इसमें पॉल्ट्री का अवशिष्ट तालाब में छोड़ा जाता है। यह तालाब की तली में सुक्ष्म पौधों यानि कवक के अंकुरण में सहायक होता है। सुक्ष्म जीव भी उत्पन्न होते हैं। ये मछलियों के आहार बनते हैं। इससे मछली को चारा की लागत में चालीस से साठ फीसदी तक बचत होती है। इसके अलावा जब तालाब की उड़ाही होती है तो इसकी गाद उर्वरक का बेहतर विकल्प देती है।

:: क्या कहते हैं मिट्टी वैज्ञानिक

डॉ उमेश नारायण उमेश ने बताया कि पॉल्ट्री अवशिष्ट जैविक खाद का सबसे अच्छा उदाहरण है। हालांकि इसमें पोषक तत्वों की सांद्रता बहुत अधिक होती है। इस वजह से ताजा अवशिष्ट का प्रयोग नुकसान कर सकता है। इसे कुछ महीने तक छोड़ देना चाहिए। इस दौरान तीन-चार मर्तबा पानी से गीला कर दें। इसके बाद मिट्टी में इसका उपयोग करें।
इसी तरह तालाब की उड़ाही में निकला पानी सामान्य पानी की अपेक्षा फसल के लिये अधिक फायदेमंद होता है। उसकी गाद उर्वरक क्वालिटी का बेहतरीन नमूना होता है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में जिस तरह रासायनिक उर्वरक और कीटनाशी का प्रयोग किया जा रहा है। उस स्थिति में एकाएक जैविक खाद का उपयोग करने से उत्पादकता घटेगी। उन्होंने क्रमशः जैविक खाद का अनुपात बढ़ाते हुए रासायनिक खाद की मात्रा घटाने की सलाह दी। इस तरह से तीन से पांच वर्ष में खेती पूरी तरह जैविक खेती हो सकती है।
इससे मिट्टी में उपजाऊ क्षमता लंबे समय तक बनी रहती है। वही, कीट-व्याधियों का असर भी फसल में कम होता है।

रिपोर्ट : गौरी शंकर प्रसाद