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नालंदा : वेस्ट डिकम्पोजर के प्रयोग से युवा किसान कर रहे सब्जी और फल की खेती,कमा रहे अच्छा मुनाफा

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* मोकिमपुर के युवा किसान एक वर्ष से कर रहे सब्जी व फल की खेती
* वेस्ट डिकंपोजर के प्रयोग से कमा रहे मुनाफा

नालन्दा (बिहार) : हरनौत बगैर रासायनिक खाद (Hernaut without chemical fertilizer) और कीटनाशी (Insecticide) के प्रयोग के खेती को असंभव बताने वालों के लिए चंडी के मोकिमपुर निवासी युवा किसान गौतम कुमार अपवाद बन गये हैं (Young farmer Gautam Kumar resident of Mokimpur has become an exception)। पिछले दस महीने से वे बगैर रासायनिक खाद और कीटनाशी के बैंगन, फुल गोभी, कद्दू, बीन, केला और अमरुद की खेती कर रहे हैं। पिछले वर्ष जुन में उन्होंने दस कट्ठा में बैंगन की खेती की थी। वेस्ट डिकंपोजर के प्रयोग से उन्होंने इस वर्ष मई तक उसकी उपज पाई। उन्होंने बताया कि दस कट्ठा की बैंगन की खेती से उन्हें 75 हजार की आमदनी हुई। यही नहीं, आवश्यकता होने पर उन्होंने खाद के रुप में पॉल्ट्री वेस्ट का भी उपयोग किया।
किसान गौतम कुमार ने बताया कि उनके पास मात्र डेढ़ बीघा की खेती है। हर बार की तरह पिछले वर्ष भी बैंगन में रोग की शिकायत हुई। आम बोलचाल की भाषा बैंगन लंगड़ा-काना हो जाता है। इसको लेकर वे तत्कालीन डीएचओ राम कुमार के संपर्क में आये। उन्होंने गौतम को वेस्ट डिकंपोजर की जानकारी दी, जिसके बाद उन्हें कृषि विज्ञान केंद्र, हरनौत से वेस्ट डिकंपोजर मिला। उन्होंने इसका प्रयोग बैंगन की खेती में किया। पर, रासायनिक खाद व कीटनाशी के उपयोग से बदली मिट्टी की प्रकृति से वे वेस्ट डिकंपोजर के प्रभाव के प्रति आश्वस्त नहीं थे।
पर, एक-दो महीने में देखा कि उनकी खेत से लगी एक बीघा में लगी बैंगन की फसल सूखकर नष्ट हो गई। पर, उनके खेत के पौधों की सेहत बेहतर हो रही थी। इसके बाद उन्होंने मई तक इसकी उपज ली। बैंगन भी स्वस्थ और चमकदार हुए। इसी तरह करीब दो किग्रा वजन तक की फुल गोभी की उपज हुई।
अमरुद भी भरपूर फले। हालांकि कोरोना (corona) संकट से उसकी बिक्री प्रभावित हुई। अभी केला की खेती परवान पर है। फल देखकर किसान काफी खुश हैं। कृषि में रासायनिक खाद व कीटनाशी की जगह डिकंपोजर के उपयोग से आज उनकी डेढ़ बीघा खेत सालाना आमदनी पांच लाख तक पहुँच गई है।
किसान ने बताया कि फसल में रासायनिक खाद व कीटनाशी देने की जरुरत नहीं पड़ी। इससे लागत कम हुई। हालांकि, डिकंपोजर के प्रयोग से श्रम अधिक करना पड़ रहा है। पर, मिलने वाले लाभ से अधिक श्रम का असर कम जाता है।

:: क्या है वेस्ट डिकंपोजर

कृषि विज्ञान केंद्र की बागवानी विशेषज्ञ डॉ विभा रानी ने बताया कि गाय के गोबर में कुछ सूक्ष्मजीव पाये जाते हैं। यही वेस्ट डिकंपोजर होते हैं।
ये अभी स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नहीं हैं। पर, इन्हें ऑनलाइन अथवा पटना से कुछ निजी लेबोरेट्री से मंगाया जा सकता है। एक बार मंगाने के बाद इन्हें खुद भी तैयार कर सकते हैं।
इसके लिए दौ सौ लीटर में दो किग्रा गुड़ का घोल तैयार करते हैं। उसमें सुक्ष्मजीवों को डाल देते हैं। मात्र बीस दिनों में इनकी संख्या कई गुनी बढ़ जाती है। इसी में से कुछ मात्रा अगली फसल के लिए डिकंपोजर तैयार करने के लिए रख सकते हैं।

:: कीटनाशी के साथ खाद पर निर्भरता खत्म हुई

किसान गौतम कुमार ने बताया कि वेस्ट डिकंपोजर के प्रयोग से कीटनाशी के साथ रासायनिक खाद पर भी निर्भरता खत्म हो गई है। सब्जी व फल के पौधों की सिंचाई के दौरान टुल्लू पंप की मदद से वेस्ट डिकंपोजर का छिड़काव करते हैं। मिट्टी में डालने के साथ पेड़-पौधों पर भी इसका छिड़काव करते हैं।
इसके अलावा जरुरत पड़ने पर वेस्ट डिकंपोजर में सरसों की खल्ली, पॉल्ट्री के अपशिष्ट व वर्मी कंपोस्ट भी मिला देते हैं। उन्हें मिलाने के बाद एक हफ्ते छोड़ कर फसल में देने से कीट-व्याधियों को रोकता ही है। साथ ही खाद का काम भी करता है। सरसों की खल्ली का उपयोग इतासंग के किसान शैलेंद्र किशोर ने बताया था।
सिर्फ यही नहीं, किसान ने बताया कि जब फसल या बगीचे के पेड़-पौधों की कटनी-छंटनी होती है, उस वक्त डंठल या तने से सारे पत्तियों को निकालकर खेत में फैला देते हैं। इसके बाद शाम के समय में उनपर डिकंपोजर छींट देते हैं। इससे पत्ते चार-पांच दिन में सड़कर मिट्टी में मिल कर उसकी उपज क्षमता को बढ़ाता है।
किसान ने बताया कि वेस्ट डिकंपोजर के उपयोग से पहले करीब एक लीटर डिकंपोजर अगली फसल के लिए रख लेते हैं।

रिपोर्ट : गौरी शंकर प्रसाद