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बिदुपुर को ओडीएफ घोषित कराने में मील का पत्थर साबित हुआ सविता का संकल्प

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– वैशाली जिले के बिदुपुर प्रखंड के चकजैनब में है आंगनबाडी केंद्र संख्या-20
– सेविका सविता कुमारी ने केंद्र के जरिये समाज को दिया जागरुकता का संदेश

वैशाली: संसाधन अगर सीमित हों फिर भी संकल्प को सिद्धि के लक्ष्य तक पहुंचा सकते हैं। इस बात को आप एक दृश्य के माध्यम से समझ सकते हैं।
” एक इलाके में बहुत से लोग घर में शौचालय के महत्व को नहीं समझते थे। पर्दे में रहने वाली बहू-बेटियों को खुले में शौच जाने की मजबूरी थी। तब समुदाय को घर में शौचालय का महत्व बताने के लिए उसी इलाके की एक बहू ने अपने हाथों में कुदाल थाम लिया। शौचालय के लिए खुद गड्ढे खोदने लगी। पर्दा के लिए चारों तरफ बांस गाड़ कर अपनी पुरानी साड़ियों से घेर देती। वह जानती थी कि यह तात्कालिक उपाय है, लेकिन उसके कुदाल का हर जोर माटी में गड्ढा के साथ-साथ लोगों के दिल-दिमाग पर भी जागरूकता की छाप छोड़ रहा था। ” समुदाय में इस व्यवहार परिवर्तन का सूत्रधार है वैशाली के बिदुपुर प्रखंड स्थित चकजैनब के आंगनबाडी केंद्र संख्या-20 की सेविका सविता कुमारी। उन्होंने कैसे इस बदलाव की नींव रखी सुनिए उन्हीं की जुबानी।

स्वच्छता के जरिये घर-घर देना था पोषण का संदेश :

सविता कहती हैं कि वह समुदाय में स्वच्छता के जरिये पोषण का संदेश देने को लेकर अपने प्रयासों में जुटी हुई थी। उन्हें एक ऐसे मंच की जरूरत थी, जहां से उनकी बात पूरे समुदाय तक जा सके। आखिरकार उन्हें एक बड़ा मंच मिल ही गया। ओडीएफ को लेकर प्रखंड कार्यालय में डीएम का निरीक्षण था। कार्यक्रम के दौरान आयोजित बैठक में सभी अधिकारी और पंचायत प्रतिनिधि मौजूद थे। डीएम ने जब कहा कि निर्धारित समयसीमा से पहले प्रखंड को ओडीएफ घोषित करा लेना है, तो आपस में चर्चा होने लगी कि इतने कम समय में कैसे शौचालयों का निर्माण होगा। सविता ने बताया कि वह भी बैठक में मौजूद थीं। उन्होंने खडी होकर कहा कि अगर हम ठान लें तो 15 दिनों में प्रखंड को ओडीएफ घोषित करा सकते हैं। ज्यादा कुछ नहीं, बस एक गडढा कर दिया जाए इसके बाद चार बांस और घर में रखी पुरानी साडियों का घेरावा करके शौचालय तैयार हो जाएगा। लक्ष्य हासिल करने के लिए बस संकल्प होना चाहिए। सविता के सुझाव की डीएम ने प्रशंसा की।

कारवां बनता गया और जुड़ते गए लोग :

सविता ने बताया कि उन्होंने शौचालय के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए हर स्तर पर प्रयास किया। प्रखंड को ओडीएफ घोषित कराने के लिए आयोजित हर जागरूकता मुहिम का हिस्सा बनी। प्रखंड में मशाल जुलूस, संध्या चौपाल और रैलियों के जरिये मुहिम को तेज किया गया तो लोगों में जागरूकता आई। पहले जिन घरों में शौचालय नहीं थे वहां भी शौचालय दिखने लगे। आखिरकार उन्होंने प्रखंड को ओडीएफ घोषित कराकर ही दम लिया। उनके अथक प्रयास पर डीएम ने उन्हें अपने कार्यालय में बुलाकर सम्मानित किया। सविता बताती हैं कि
स्वच्छता के रास्ते उन्होंने पोषण का लक्ष्य हासिल करने में सफलता पाई। उनके पोषक क्षेत्र में 90 प्रतिशत से अधिक बच्चे ग्रीन जोन में हैं।

समाज में बेटा-बेटी के पालन-पोषण में भेदभाव को रोका :

सविता बताती हैं कि हमारे समाज में यूं तो अब बेटा-बेटी में कोई भेदभाव नहीं रह गया है। लोग दोनों के पालन-पोषण और शिक्षा पर बराबर ध्यान देने लगे हैं। लेकिन जहां कहीं भी बेटा और बेटी के पालन-पोषण में भेदभाव दिख जाता है तो वे इसे दूर करने के प्रयास में लग जाती हैं। वे बताती हैं कि उनके पोषक क्षेत्र में एक अभिभावक अमलेंदु कुमार की बच्चियां उनके आंगनबाडी केंद्र में पढती थीं। बच्चियां काफी प्रतिभाशाली थीं। वहीं बेटा थोडा औसत था, लेकिन अभिाभावक लडके को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढवा रहे थे। सविता ने बताया कि उन्होंने उनके अभिभावक को समझाया कि बेटे के साथ-साथ बेटी को भी समान अवसर मिलना चाहिए। बेटियां आज हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रही हैं। उनकी बातों को अभिभावक ने गंभीरता से लिया। इसी तरह सविता बाल विवाह के खिलाफ हैं। उनका मानना है कि जब तक किशोरी तन और मन से वयस्क ना हो जाए, उसकी शादी नहीं करनी चाहिए। इसके लिए भी उनका जागरुकता का प्रयास रंगा लाया। वे किशोरियों के स्वास्थ्य पर भी काम करती हैं। सैनिटरी पैड का उपयोग और आयरनयुक्त हरी साग-सब्जियां खाने के लिए किशोरियों और गर्भवती महिलाओं को प्रेरित करती हैं। किशोरियों को केंद्र पर व्यायाम भी कराती हैं।

गाना- बजाना के जरिये समुदाय के बीच ले जाती हैं पोषण का संदेश :

सविता कहती हैं कि वे हर उस माध्यम का उपयोग करती हैं, जिनके माध्यम से समुदाय को आकर्षित कर उन तक संदेश पहुंचाना सुगम हो।
वे केंद्र पर अन्नप्राशन या गोदभराई का क्रियाकलाप आयोजित करने के लिए सुबह से ही पोषण संदेश से जुडे गाने बजवाती हैं, ताकि एक उत्सव जैसा माहौल बन जाए। इतना ही नहीं किशोरियों की एक टोली भी बनाई है, जिसके साथ वे घर-घर दस्तक देती हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य से जुडे हर क्रियाकलाप के लिए वे प्रचार माध्यमों का खूब इस्तेमाल करती हैं। सविता बताती हैं कि घर-घर से जुडे रहने के कारण लोग एक अभिभावक की तरह मानने लगे हैं। वे बच्चों के पोषण और शिक्षा को लेकर उनकी सख्ती को भी अन्यथा नहीं लेते। अभिभावक जानते हैं कि वे उनके भले के लिए बोलती हैं। सविता का कहना है कि उनके प्रयास से आज शत-प्रतिशत बच्चा स्कूल जाने लगा है।

पोषक क्षेत्र में संवाद स्थापित करने के लिए बनाया वाटसपएप ग्रुप :

सविता बताती हैं कि सूचना तकनीक का जमाना है। आज सबके पास स्मार्ट फोन है। लोग हमेशा फेसबुक और वाटसएप देखते रहते हैं। उन्होंने अपने पोषक क्षेत्र में सबसे संवाद स्थापित करने के लिए एक दूसरे को फेसबुक और वाटसएप से जोडा। मोबाइल में जो आईसीडीएस के एप के जरिये 10 मॉडयूल दिए गए हैं, उनके अनुसार अपने काम को काफी हद तक सुगम किया। उनके पोषक क्षेत्र में ज्यादातर लोग शिक्षित हैं, इसलिए उन्हें लोगों को समझाने में काफी आसानी होती है।

कुशल नेतृत्व क्षमता के कारण संभाल रहीं जिलाध्यक्ष का पद :

सविता अभी आंगनबाडी कर्मी संगठन वैशाली की जिलाध्यक्ष हैं। वे बताती हैं कि जिलाध्यक्ष होने के नाते वे आंगनबाडी सेविकाओं को अधिकार से ज्यादा कर्तव्य पर जोर देने को प्रेरित करती हैं। उनका कहना है कि सरकार ने आंगनबाडी केंद्र को बडी जिम्मेवारी दी है। सामुदायकि स्वास्थ्य जैसे अहम कार्यक्रम की बागडोर आंगनबाडी के हाथों में है। जिम्मेवारी अहम है तो कर्तव्यबोध भी पूरा रहना चाहिए। वैशाली डीपीओ माला कुमारी भी सविता के काम की सराहना करती हैं। उनका कहना है कि सविता के जरिये संचालित आंगनबाडी केंद्र अच्छा काम कर रहा है।

रिपोर्ट : अमित कुमार