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वैशाली : चमकी में ग्रामीण चिकित्सक के चक्कर में नहीं पड़ समय पर पहुंचाए बच्चों को अस्पताल

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• चमकी के लक्षण दिखते ही ले जाएं सरकारी अस्पताल
• झोला -छाप डॉक्टर और ओझा-गुणी से रहें दूर

वैशाली 13 जुलाई : जंदाहा गांव (Jandaha Village) के झम्मनगंज गांव के 8 वर्षीय प्रिंस चमकी की चपेट (8-year-old Prince Chamki is vulnerable) में आकर वह अपने परिवार से हमेशा के लिए दूर हो चुका है. यदि उसके परिजन प्रिंस को ग्रामीण चिकित्सकों की जगह सरकारी अस्पताल ले जाते तो शायद उसकी जान बचायी जा सकती थी। प्रिंस के साथ हुए हादसे ने एक बार फिर चमकी बुखार (Fever) में समय पर अस्पताल (Hospital) पहुंचने (Pahuchaya)की महत्ता के साथ लोगों को जागरुकता के विभिन्न पहलुओं पर सोंचने को विवश किया है।
इस संबंध में संचारी रोग पदाधिकारी डॉ सत्येन्द्र कुमार कहते हैं चमकी के लिए प्रत्येक पीएचसी और सीएचसी में दो बेड के वातानुकुलित वार्ड (Air conditioned ward) के साथ समुचित संसाधनों और दवाओं की उपलब्धता (Availability of appropriate resources and medicines) है। साथ ही सभी अस्पतालों में प्रशिक्षित चिकित्सकों की देखरेख में चमकी बुखार से ग्रसित बच्चों का ईलाज किया जा रहा है. उन्होंने बताया सभी अस्पतालों में एसओपी के तहत ही चमकी बुखार का ईलाज किया जाता है। इसमें सबसे पहले चमकी के कारणों का पता लगाकर भर्ती होने वाले बच्चे का ग्लूकोज लेवल मापा जाता है. उन्होंने बताया अधिकतर मामलों में हाइपोग्लेसेमिया (Hypoglycemia) की कमी के कारण बच्चे की मौत (Child died due to deficiency) की संभावना बढ़ जाती है.

समय पर पहुचाएं अस्पताल:

डॉ सत्येन्द्र कहते हैं कि एईएस में लक्षण आने के बाद 45 मिनट काफी महत्वपूर्ण है। इस दौरान अगर एईएस पीड़ित अस्पताल पहुंचता है तो उसकी जान बिल्कुल ही बचायी जा सकती है। पिछले वर्ष ग्रामीण चिकित्सकों को चमकी पर प्रशिक्षित किया गया था, पर लोभ वश कुछ चिकित्सक सही सुझाव नहीं देते हैं। वहीं नीजी संस्थानों के डॉक्टरों को भी इस बीमारी(Bimari)  के ईलाज का प्रशिक्षण नहीं मिला है, जिस कारण वहां भी सही ईलाज नहीं हो पाता है। वहीं सरकारी अस्पतालों में इसके ईलाज (Treatment) की समुचित व्यवस्था (arrangement) होती है। जैसे ही किसी अभिभावक को अपने बच्चे में मुंह से झाग आने, शरीर में ऐंठन, तेज बुखार, दांत लगना या बेहोशी जैसे लक्षण दिखे उसे तुरंत ही नजदीकी पीएचसी या सीएचसी लाएं। इसके लिए एम्बुलेंस तथा प्रत्येक पंचायत में प्राइवेट टैग वाहन की व्यवस्था है। अभिभावक क्षेत्र की जीविका, आशा से भी इस मामले में मदद ले सकते हैं।

चमकी पर रखें सावधानी से नजर:

आपके बच्चे को चमकी न हो इसके लिए भी कुछ सावधानियों को रखने की जरुरत है। जिसमें बच्चों को रात में भूखे न सोने देना, धूप में न खेलने देना, रात के खाने में बच्चों को मीठा पदार्थ जैसे गुड़, खीर, सेवइया देना। अगर बच्चा खाना नहीं खा रखा तो उसे ओआरएस का घोल अवश्य दें। अक्सर यह देखा गया है कि चमकी का प्रभाव सुबह के वक्त ज्यादा आता है. इस लिहाज से भी अभिभावक अपने बच्चों को खुद से हिलाकर सुबह उठाएं। वहीं चमकी के लक्षण दिखते ही साफ व ताजे पानी से बच्चे का शरीर को पोछें। अगर उसका शरीर ऐंठा गया हो तो उसे उसी अवस्था में अस्पताल जल्द से जल्द पहुंचाएं। अगर एक शब्द में कहें तो सावधानी ही एईएस से बचाव का रास्ता है।

रिपोर्ट : अमित कुमार