Wed. Apr 14th, 2021

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पोषण को लेकर जब लोगों में जगा विश्वास , बदलाव के रास्ते बन गए आसान

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• प्रत्येक कदम पर रही चुनौती, नहीं मानी हार
• अपनी मेहनत से सेविका आरती ने लिखी बदलाव की कहानी

मधुबनी:सुपोषण का रास्ता कुपोषण की चुनौतियों को मात देकर ही तैयार हो सकता है। यदि समुदाय की बुनियादी जरूरतों में पोषण शामिल हो जाए तो सुपोषण की राह और भी आसान हो सकती है| कुपोषण से निपटने के लिए सरकारी महकमा पोषण पुनर्वास केन्द्रों जैसी सशक्त पहल को तो बढ़ावा दे ही रही है साथ हीं जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर अहमदा प्रखंड के सुखरामपुर मुसहरी बेलवर गाँव के बच्चों को सुपोषित करने की कई अनोखी पहल भी हो रही है। इस पहल को मूर्त रूप देने में गाँव की आंगनबाड़ी केंद्र संख्या- 16 की सेविका आरती कुमारी दिन-रात जुटी हैं।

लाभार्थी के घर को ही बनाया पोषण पुनर्वास केंद्र:
सुखरामपुर मुसहरी बेलवर गाँव निवासी रमेश सदाय एवं विष्णु देव सदाय की 1.5 वर्षीय बच्ची खुशी कुमारी एवं 2 वर्षीय बच्चा अंकित कुमार कब कुपोषण की जद में आ गया रमेश एवं विष्णु देव को मालूम ही नहीं चला। ऊपर से जागरूकता के अभाव में दोनों ने बच्चे पर कभी ध्यान भी नहीं दिया। गृह भ्रमण के दौरान आरती ने जब अंकित एवं खुशी की दयनीय स्थिति देखी तो उनसे रहा नहीं गया। वह जानती थी बच्चे के पिता को समझाने का यह उचित समय नहीं था। बच्चे की आँखों से टपकती मासूमियत आरती को उसे कुपोषण से मुक्त करने के लिए प्रेरित किया। आखिरकार आरती ने किसी तरह बच्चे के माता-पिता को समझा कर पोषण पुनर्वास केंद्र भेजने का आग्रह किया परंतु वहां किसी एक को अंकित एवं खुशी के साथ रहना पड़ता जो परिवार के लिए संभव नहीं था| तब सेविका आरती देवी ने उसे घर पर ही प्रतिदिन फॉलोअप करना शुरू किया एवं पोषक आहार देना शुरू किया।कुछ ही दिनों में अंकित एवं खुशी की सेहत सुधरने लगी| आरती ने बच्चे के माता-पिता को बैठाकर पूरी बात समझाई एवं इस बात का आश्वासन भी लिया कि वह बच्चे की खान-पान का ख्याल रखेंगे तो बच्चा कुपोषण से मुक्त हो जाएगा। यह तो सिर्फ एक वाक्या है। यदि आप इस गाँव में पहुंचेंगे तो आपको ऐसे और उदाहरण सुनने को मिलेंगे, जो इस बात की पुष्टि करते दिखेंगे कि किस तरह पोषण एवं स्वास्थ्य की पथरीले रास्ते को सुगम बनाने में आरती जुटी हैं।

अन्नप्राशन पर तोड़ी लोगों की मिथक:
आरती कहती हैं, ‘‘हमारे पोषक क्षेत्र में बच्चों के माता-पिता में यह धारणा थी कि अगर बच्चे को कम उम्र (180 दिनों के बाद) में आहार दिया जाए तो बच्चे का पेट बाहर आ जाता है| इससे लोग अन्नप्राशन आयोजन में अपने बच्चों को शामिल करने से कतराने लगे थे। मैंने इसे गंभीरता से लेते हुए लोगों को समझाया कि बच्चे के लिए ठोस पोषक आहार कुपोषण दूर करने के लिए काफी जरूरी है| यह प्रयास इतना आसान नहीं था।इसके लिए मैंने कई बार लोगों को समझाया| मोबाइल कुंजी से अन्नप्राशन के संदेश भी सुनाया। धीरे-धीरे यह बदलाव आया कि आज लोग अन्नप्राशन के लिए सिर्फ़ केंद्र आते ही नहीं हैं, बल्कि लोग इसके विषय में जागरूक भी हुए हैं|’’

टीकाकारण को लेकर भ्रांतियों को किया दूर:
एक दौर था जब टीकाकारण को लेकर इस गाँव काफी भ्रांतियाँ फैली थी। ‘‘टीका लगाने के बाद बच्चा बीमार पड़ जाता है। बच्चे को बुखार एवं उल्टी होती है।‘’ कुछ ऐसी ही भ्रांतियाँ टीकाकरण को लेकर फैली थी। आरती कुमारी ने इस पर भी बेहतर कार्य किया। गाँव के कई बच्चों के उदाहरण देकर उन्होंने टीकाकरण के कारण होने वाले साइड इफ़ेक्ट के विषय में लोगों को जागरूक किया। उनकी यह कोशिश भी कारगर साबित हुयी। पहले माताएँ जहाँ अपने बच्चे को टीकाकरण सत्र पर लेकर नहीं जाती थी, वहीं अब ग्रामीण स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पोषण दिवस पर बच्चों की शत-प्रतिशत उपस्थिति रहती है।

लोगों को समझना जरूरी :
आरती बताती हैं लोगों को जागरूक करने के लिए उन्हें अच्छी तरह समझना जरूरी है। कई बार लोग बदलना चाहते हैं, लेकिन उन्हें बदलाव का कोई ठोस वजह नहीं समझ आता है। इसलिए उन्हें समझाने के लिए उनकी तरह सोचना भी जरूरी होता है। उन्होंने बताया 16 साल के कार्य-काल में उन्हें लोगों के साथ भावनात्मक स्तर से जुडने में सफलता मिली। यही जुड़ाव इस बदलाव को सच करने में सहायक भी साबित हुई । लोगों में टीकाकरण एवं संस्थागत प्रसव को लेकर जागरूकता में काफी इजाफ़ा हुआ है। जो सही दिशा में किए गए प्रयासों को दिखाता है।

रिपोर्ट : अमित कुमार